Swargiya Pratidhwani (Todays Thought)

0 32

- Advertisement -

“सात बार नहीं वरन सात बार के सत्तर गुना तक माफ करें और आज़ाद होना सीखें”

यदि हमारे साथ कोई बुरा व्यवहार करता हैं तो हम उसे एक या दो बार उन्हें माफ़ कर देते हैं। परन्तु जब वह व्यक्ति वही गलती बार बार करे तो कहीं ना कहीं हम उसे माफ नहीं कर पाते हैं। माफ ना करने के कारण हमारे जीवन में इससे दो बातें आ सकती हैं। पहली अब हमारा उस व्यक्ति के साथ पहले जैसा रिश्ता ना रहे। दूसरा कि हम अपनी व्यक्तिगत शांति को खो सकते है। क्योंकि हमने उस व्यक्ति को माफ नहीं किया हैं। उसे माफ ना करने के कारण हम जब जब उस व्यक्ति के बारे में सोचेंगे तो हमें उसके दिया हुआ दर्द याद आ सकता हैं, जो हमारी व्यक्तिगत शांति को खो सकता हैं। हमें ऐसे में क्या करना चाहिए? यदि हम चाहते हैं कि हम शांति से रहे, तो सबसे पहले हमें उस व्यक्ति को दिल से माफ करना होगा। दूसरा यदि हमें उसके साथ रिश्ता बनाए रखना हैं तोभी हमें उसे माफ करना बहुत ही जरूरी हैं। यीशु मसीह हमें सिखाते हैं कि एक या दो बार नहीं वरन सात बार के सत्तर गुना यानी चार सौ नब्बे बार तक माफ करना हैं। इसका मतलब हैं कि यदि हमारा सामने वाला व्यक्ति गलती करें तो हमें माफ करने वाला का दिल रखना हैं, जब वह दिल से और पश्चाताप के साथ माफ़ी मांगे तो हमें यीशु मसीह जैसे माफ करने में थकना नहीं हैं। अतः हम माफ करना सीखें और अपनी व्यक्तिगत शांति को बनाए रखे। धन्यवाद🙏
शुभ प्रभात

Comments
Loading...
error: Content is protected !!