स्वर्गीय पुकार

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जब मौत मुझे पुकार रही थी
सांसे मेरी थम रही थी
नयन मेरे धुंधले हो रहे थे
प्राण मेरा निकल रहा था

अपने मुझे पुकारते रहे
ग़ैर मुझे ताकते रहे
अश्क ना फिर भी भरे थे मेरे
दिल भी ना भरा था दुख से

दौड़ता रहा मैं ख़ुशी से
बाहें अपनी फैलाते हुए
गरजती हुई इक आवाज़
गूंजी मेरे कानों में

छूट गया तेरा सब कुछ
उस मोहिनी दुनिया में
फिर भी क्या पाने के लिए
दौड़ता हैै तू इस कदर

हाँफता हुआ मैं थमा और बोला
मिलन का दिन है ये आया
आँखें मेरी दर्शेंगी उसे
उस कलवरी क्रूस की मोहब्बत को

पावों पर गिरूंगा उस प्रेम के
भरे नैनों से पूछूंगा मैं
क्यों सहा दुःख मुझ पापी के लिए
क्यों दी जान, गोलगुता के पहाड़ी मे

मोहिनी दुनिया से बढ़कर
भर रहा है तन-मन मेरा
रोक सकूँ न खुद को मैं
स्वर्गीय उस सानिध्य से

छोड़ कर कैसे जाऊं
मेरी इस आशा से मैं
हाँफता रहा जग भर
स्वर्गीय पुकार की आशा में मैं

BETTY SAM

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